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कोटि चरण बढ़ रहे ध्येय की ओर निरन्तर – अटल बिहारी वाजपेयी | Koti Charan Badh Rahe Dhyey Ki Ore Nirantar – Atal Bihari Vajpayee

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यह परम्परा का प्रवाह है, कभी न खण्डित होगा।
पुत्रों के बल पर ही मां का मस्तक मण्डित होगा।

वह कपूत है जिसके रहते मां की दीन दशा हो।
शत भाई का घर उजाड़ता जिसका महल बसा हो।

घर का दीपक व्यर्थ, मातृ-मंदिर में जब अंधियारा।
कैसा हास-विलास कि जब तक बना हुआ बंटवारा?

किस बेटे ने मां के टुकड़े करके दीप जलाए?
किसने भाई की समाधि पर ऊंचे महल बनाए?

सबल भुजाओं में रक्षित है नौका की पतवार।
चीर चलें सागर की छाती, पार करें मंझधार।

…ज्ञान-केतु लेकर निकला है विजयी शंकर।
अब न चलेगा ढोंग, दम्भ, मिथ्या आडम्बर।

अब न चलेगा राष्ट्र प्रेम का गर्हित सौदा।
यह अभिनव चाणक्य न फलने देगा विष का पौधा।

तन की शक्ति, हृदय की श्रद्धा, आत्म-तेज की धारा।
आज जगेगा जग-जननी का सोया भाग्य सितारा।

कोटि पुष्प चढ़ रहे देव के शुभ चरणों पर।
कोटि चरण बढ़ रहे ध्येय की ओर निरन्तर।

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